प्रसून कंटक

कसम तेरी तुझे ऐ कंटक! मुझे तन्हा ना छोड़ना,
जिंदगी कातिल लगती है, हमदर्द काँटों के बिना।
कांटे हैं हमदर्द की चुभन इनकी आह देती है,
ही तो हैं मेरी, जो मुझे वाह देती हैं। 

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