कानून और उसके बेबस रखवाले...

Thursday, April 09, 2009

शमाजी के पोस्ट को पढ़ रहा था...कानून को लेकर उन्होंने एक अच्छी चर्चा शुरू करने की चेष्टा की है...साथ ही पूर्व उप-राष्ट्रपति के उद्गारों का उल्लेख भी उन्होंने किया है... इस मुद्दे पर उनकी चिंता जायज़ है और इस लेख से पता चलता है कि हमारे राष्ट्र के उच्चतम शिखर पर बैठे महानुभाव जमीनी हकीकत से अन्भिज्ञं नहीं हैं...

मेरा हमेशा से मानना रहा है कि देश में हर क्षेत्र में सुधार की अव्यश्यकता है और यह सम्भव भी है...जरुरत है कि हम नागरिक इन समस्यायों से परिचित हों और कोशिश करें कि इसमें सुधार के लिए जो भी सम्भव हो करें...

जहाँ तक जानकारी कि बात है... अधिकतर लोग इन जटिल समस्याओं से अवगत हैं...

कुछ बातें हैं जिनपर मैं आपलोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा...

भारत एक बड़ी जनसँख्या और जटिल व्यवस्था वाला देश है... तो यहाँ अपराध भी अनेक प्रकार के होते है लेकिन उनको रोकने का पर्याप्त साधन नहीं है और इच्छाशक्ति कि कमी भी है...

मैंने पढ़ा है कि भारत में १००० व्यक्ति पर १ से भी कम पुलिश वाले हैं... और कल ही एक न्यायमूर्ति के बयां से जाना कि यहाँ १०००,००० लोगो पर केवल १०.५ जज हैं...

इस स्थिति में अपराध को कम करना या मुकदमों का जल्दी निबटारा करना बहुत ही मुश्किल कार्य है इसके अलावा ऐसे कानून हैं कि कानून के रखवालों के हाथ भी बंधें होते हैं... करेला पर नीम चढा वाली हालत तब हो है जब नेता और समाज के प्रतिष्ठित लोग न्यायिक प्रक्रिया में दखल देने लगते है...

इधर पुलिस रेमोर्म का कुछ प्रयास हो रहा है...

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