बूढ़े की लाठी

Thursday, June 18, 2009

टेकता लाठी

एक बूढा

बढ़ रहा है

रास्ते के ठोकरों से

क़दमों को बचाते

लड़खड़ाते।


सोचते हुए-

"अब पाया लाठी

लाभ क्या?

लड़ सकता नहीं

चल भी सकता नहीं

जब

बिन सहारे।"


उसकी आँखे

खोज रही हैं

एक जवान

उत्तराधिकार सौंपने को

लाठी थमाने को।


शायद

बूढे के डगमगाते कदम

मजबूत हो जायें

मजबूत बांहों का

सहारा पाकर

कि वह

कुछ और आगे बढ़ सके

और

अपनी लाठी-

जीवन के अनुभव को

सही हाथों में

सौंप जाए।


बुदबुदा रहा है वह-

ऐ युवा!

थम ले बढ़कर

मेरी लाठी,

पा ले

बुजुर्ग जीवन की कमाई

शुभाशीष में

आज ही।

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