बूढ़े की लाठी

टेकता लाठी

एक बूढा

बढ़ रहा है

रास्ते के ठोकरों से

क़दमों को बचाते

लड़खड़ाते।


सोचते हुए-

"अब पाया लाठी

लाभ क्या?

लड़ सकता नहीं

चल भी सकता नहीं

जब

बिन सहारे।"


उसकी आँखे

खोज रही हैं

एक जवान

उत्तराधिकार सौंपने को

लाठी थमाने को।


शायद

बूढे के डगमगाते कदम

मजबूत हो जायें

मजबूत बांहों का

सहारा पाकर

कि वह

कुछ और आगे बढ़ सके

और

अपनी लाठी-

जीवन के अनुभव को

सही हाथों में

सौंप जाए।


बुदबुदा रहा है वह-

ऐ युवा!

थम ले बढ़कर

मेरी लाठी,

पा ले

बुजुर्ग जीवन की कमाई

शुभाशीष में

आज ही।

Popular posts from this blog

Grow your business with Facebook Ads

Delhi Star Kids DSK