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गाँव की ओर

Thursday, March 17, 2016

उन्नति की होड़ में

जाते क्यों हैं भूल,

आदम की जात है

धरती की हैं धूल।


जीवन की दौड़ में

निकालें कितनी दूर,

उम्र की ढलान पे

थकेंगे हम जरुर।


उखड़ अपनी जड़ से

फैलते चले गए,

सिमटती दुनियाँ में

ख़ुद से बिछड़ गए।


वापस लौटकर हम

चलें गाँव की ओर,

और छोड़कर अहम्

पायें माँ की गोद।