छाया मेरे अतीत की 08/05/2009

तू छाया मेरे अतीत की
सपनों में यूँ भरमाती है,
रात अँधेरी होने पर
तन-मन से लिपट जाती है।

मैं तेरे देह के भ्रम में
नींद में जागृत हो जाता हूँ,
अहसास प्यार का पाकर
मदहोश बिखर-सा जाता हूँ।

जब सुबह कहानी कहती है
गुज़रे रात के ख्वाबों की,
तब सलवटें मुझें खलती हैं
पसरे कोरे चादरों की।

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