एक नया जहाँ बसा 22/04/2009

खामखां सर पटकते हो

पत्थरों में अब नारायण नहीं बसते।


आसमां सर पे उठाते हो

शहरो में अब इन्सान नहीं रहते।


मजमा समेट वह चल दिए

सड़कों पे अब कद्रदां नहीं मिलते।


कारवां गुजरे वक्त गुजरा

क़दमों के अब निशां नहीं मिलते।


किस्मत से तू जो है इंसान बचा

रेगिस्तान में अपने निशां छोड़ जा.


हिम्मत है तुझमें तो एक नया जहाँ बसा

इंसानियत के लिए एक मुकाम छोड़ जा।

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