हमसफ़र राहें

Sunday, March 27, 2016

कदम-कदम बढाये जा
तू राहगीर बन जाएगा,
सकपकाता क्यूँ है बन्दे
कुछ-न-कुछ तो पायेगा।


हमसफ़र होती हैं राहें
हर कदम पर साथ हैं,
तुझमें होगी कुव्वत जैसी
वैसी ही मंजिल पायेगा।

हर कदम जो तय किया
मंजिलों की ओर तूनें,
आने वाले वक्त में वह
मंजिल ही कहलायेगा।

गुजरे क़दमों के निशान ही
राह बनाते जाते हैं,
मंजिलों की राह बताने
राही ना वापस आयेगा।

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