होली के नवरंग...

इस बरस रंगीली होली में तन ना रंगाऊं, मन रंगाऊं।
इस बरस उम्र की डोली में, मैं ना जाऊँ, ठहर ही जाऊँ।

इस बरस सखियों की ठिठोली से मैं क्यों घबराऊँ, मैं तो मुस्काऊँ।
इस बरस जीवन के रंगों को मैं ना पाऊँ तो कब पाऊं।

इस बरस रति के अंगों को मैं ना सजाऊँ तो कब सजाऊँ?
इस बरस यौवन की कलियों को मैं ना चत्काऊँ तो कब चत्काऊँ?

इस बरस प्रेम के सागर में मैं ना नहाऊं, डूब ही जाऊं।
इस बरस बदन की अग्नि को मैं ना बुझाऊँ और भड़काऊं।

इस बरस बाबुल के आँगन को मैं ना छोडूं तो कब छोडूं?
इस बरस पिया के सपनों को मैं ना देखूं तो कब देखूं?

इस बरस साजन की बाहों में मैं ना जाऊं तो मर ही जाऊं।
इस बरस रंगीली होली में तन रंगाऊं, मन भी रंगाऊं।

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