जागो रे इंसान! 06/06/2009

बड़ी-बड़ी बातें करना हम इंसानों की फितरत होती है और उपदेश देना ज्यादातर लोगों की आदत। नैतिकता एवं आदर्शों पर भाषण देना किसे अच्छा नही लगता? 

क्षमा याचना के साथ अपने एक परम आदरणीय के द्वारा कहा एक किस्सा बताता हूँ। 

बात सन १९४७ के आसपास की है। एक विद्यार्थी अपने गुरूजी के लिए पान लेने गया। पानवाले ने पान देने से मनाकर दिया क्योंकि वह सिक्का ( एकन्नी या चवन्नी ) खोटा था। गुरूजी थे तो गांधीवादी, लेकिन चार- छः विद्यार्थियों को भेज पान वाले को सबक सिखाया अवश्य। 

चालीस वर्ष बाद भी उन्हें इसका कोई मलाल नहीं था क्योंकि उस बेचारे ने एक उच्चवर्ग के सम्मानीय गुरु का अपमान करने का अपराध किया था। वह पान दे देता तो बाद में उसे पैसे मिल ही जाते।

इसी प्रकार मेरे एक मित्र के दादाजी बचपन में उसे लेकर द्वार पर बैठते और आने-जाने वाले निम्न वर्ग के लोगों को उससे गालियाँ दिलाते या पिटाई करवाते। यह उच्चता की भावना की पराकाष्ठा थी और यह होता रहा है एवं होता रहेगा। 

इसका कारण जातीय उच्चता नहीं बल्कि पद और पैसे का रॉब ज्यादा लगता है। सामाजिक विषमता का सबसे बड़ा कारण  पढ़ाई पद-पैसा का असमान बिखराव ही प्रतीत होता है। 

यह वर्ग-भेद हमारे जीन तक में घुस गया है और इसके अनेक रूप देखने को मिलते हैं। अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित, गोरे-काले और हिंदू- मुस्लिम- सिख-इसाई का जो भेद है वह घट-बढ़ नहीं रहा बल्कि समीकरणों में परिवर्तन हो रहा है। 

एक भारतीय राजनितिक समाज है जिसे धर्म व जाति से कुछ लेना-देना नहीं है केवल वोट उनके लिए मायने रखता है। दूसरा आर्थिक दृष्टि से उच्च वर्ग है जो इन पचरों में नहीं पड़ता। अपनी साख एवं स्तर बनाये रखने के जुगत में लगा रहता है।

मध्य-निम्न और निम्न जो इन सारे भेदों को ढोताजा रहा है। "समरथ को नहीं दोष गोसाईं" पाँच सौ वर्ष पहले लिखा गया था जिसे आज भी यह वर्ग ढोता है और तथाकथित उच्च वर्ग की कदमबोशी में लगा रहता है। 

कष्ट होता है जब देखता हूँ किकुछ लोग जो किसी ज़माने में एक खंडन कि चाकरी किया करते थे आज भी त्यौहार या समारोह के वक्त नेग लेने चले जाते हैं। यह हक जताना नही निम्नता को स्वीकार करना है। हाथ पसारकर सम्मान नही मिलता। हाथों को जेब में रखें, सर उठाकर आंखों में देखो और कहो---हम भी इंसान हैं, वक्त हमारा आ गया...

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