कभी-कभी... 06/12/2009

बालकोनी की ओर उठती है नज़र कभी-कभी,

तेरे चेहरे पर जाती है ठहर कभी- कभी।


यूँ तो इस गली से मेरा गुजरना होता नहीं,

शाम में शायद सिमट जाता है शहर कभी-कभी।


दिल मेरा और यह इलाका हराभरा है नहीं,

यकायक आ जाती है बारिश कभी-कभी।


इंसानों की नीयत का ठिकाना होता नहीं,

मुसलमां हैं लेकिन पूजते हैं पत्थर कभी-कभी।


नजाकत और नफासत मेरी शायरी में नहीं,

भटक जाती है कलम नीरज की मगर कभी-कभी।

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