खिड़की पे लटका एक परदा 22/06/2009

मैं हूँ खिड़की पे लटका एक परदा,
देखता हूँ सब कुछ नहीं कहता।

है क्यूँ हैरान वो यह ख़बर पढ़कर,
उसके रास्तेमें क्या गड्ढा नहीं पड़ता।

अंधे-बहरों का वक्त गुजरता है मजे से,
पड़ोस में कौन जन्मा, कौन मरा न पता।

इंसानों की बस्तियां सिमटी है ऐसे,
चाँद की ख़बर है दिल्ली का न पता।

राम तेरी दुनिया हुई है आज कैसी,
आता जाता कोई भी अंदर न झांकता।

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