मेरे सामने वाली खिड़की 27/03/2009

Tuesday, March 22, 2016

मेरी नजर टिकी थी
एक बंद खिड़की पे,
धूप पसर रही थी
बदरंग खिड़की पे।

मुहब्बत हो गई थी
सुनसान खिड़की से,
हसरतें बढती गई
जान-ऐ-मन खिड़की से।

काश! तू भी झांकती
कमबख्त खिड़की से,
तन्हाई क्यों तंगी थी
हर वक्त खिड़की से?

शाम-ओ-सहर हम रहते थे
बेकरार खिड़की पे,
अब और नहीं करेंगे
इंतज़ार खिड़की पे।

कल देखा था एक बार
अधखुली खिड़की से,
बाहों में मेरे रकीब के
लग खड़ी थी खिड़की से।

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