बचपन की आली

Thursday, April 14, 2016

अधखिली कली वो जूही की

मेरे बचपन की आली थी,

मेरे सपनो की गलियों में

फिरती बनी मतवाली थी।


चंचल चितवन, गोरी शबनम

सोम-सुधा की प्याली थी,

वह वसंत के दिन में

मेरे जीवन की हरियाली थी।


जब यौवन सावन घिर आया

दूर खड़ी भरमाती थी,

गुमसुम गुपचुप नयनों से

उसकी छुअन सहलाती थी।


पाक जिस्म मैं, मन से भोला

वो मासूम हिय की वाणी थी,

गया वसंत ना आएगा

हुई मुझसे नादानी थी।

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