अपनी राह, अपना मुकाम?

Thursday, May 05, 2016

हर वक़्त ख़ुद को चौराहे पर खड़ा पाता हूँ,
टार्च पास नहीं अंधेरे में भटक जाता हूँ।

जो सीधे रास्ते चले थे आगे निकल गए,
हम नए राह की खोज में पिछड़ते चले गए।

वक्त का तकाजा समझा ठोकरों के बाद,
लहूलुहान थी शख्सियत खुले थे मेरे हाथ।

गर चाहते हो तुम दामन भरा हो खुशियों से,
करो मेहनत गुजरो सदा पुरानी राहों से।

कतरा-कतरा जिंदगी जिहाद का ऐलान है,
हरेक रास्ता हिम्मती के पाँव का निशान है।

उस आदमी की मिट्टी होती है कुछ खास ही,
ख़ुद बनाता है जो अपनी राह भी, मुकाम भी। 

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