बदन... एक ग़ज़ल

Tuesday, March 13, 2018

जोश है इस जिस्म में, जज्बात से सिहरता बदन,
जंग से हालात हैं, हर रात है पिघलता बदन।

आरज़ू-ए-वस्ल वो, खूंखार आज बाकी नहीं,
साथ हो बस हमसफ़र, तन्हा पड़ा तरसता बदन।

कायदा संसार का इंसान पे लिपटता कफ़न,
फ़र्ज़ की अदायगी, दर-ब-दर भटकता बदन।

जिंदगी में जख्म के मायने बदलते रहे,
जिस्म है जूनून है, हर दर्द से कसकता बदन।

है तकाज़ा उम्र का, नापाक नस्ल काहे कहें?
दायरों को तोड़ता, आमान युग बदलता बदन।

नीर में नीरज हुआ, पंकज हुआ सड़े पंक में,
वक़्त ने बदली जमीं, देखो नहीं बदलता बदन।

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