एक बूढा पेड़

मेरे घर के बगल से
गुजरती एक सड़क पे
पेड़ एक खड़ा है
सुखा हुआ, नंगा;

पत्ते गिर चुके जिसके
टूट चुकीं कई टहनियां हैं।

साथ में खड़े कई पेड़ हैं
हरे- भरे झूलते-झूमते,
अपने में मस्त हैं
बारिश की बूंदों को समेटते
हवा के झोकों संग नाचते।

मैं देखा करता हूँ
सूखे पेड़ को कुढ़ते,
पक्षियों को घूरते,
तोतों से चिढ़ते,
टहनी- टहनी टूटते-बिखरते।

वो मुझसे कुछ कहता है,
मेरी उदासी बढ़ा देता है,
अपनों के बीच खड़ा है,
उन सबसे अलहदा है।

मैं उसे देखा करता हूँ
और इंतजार करता हूँ,
एक आखिरी झोंका आए
यह पेड़ गिर जाए।

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