मेरा कमरा

मेरा कमरा

और मेरी याददाश्त

दोनों हैं भरे

सड़ी घुटन से,

उनके बीच में

मैं रहता हूँ....


बदलते मौसम

और गुजरते दिन

लाते रहे हैं

कितने बदलाव-

अच्छे और बुरे

मैं छांटता हूँ...


कडवी यादों को

मिटा सकूँ

जेहन से

किसी तरह,

इसी प्रयास में

मैं रहता हूँ...


सुनहले पलों को

घर में अपने

सजा सकूँ

सिलसिलेवार,

ऐसी कोई तरकीब

मैं खोजता हूँ...


कभी कभी जब

मन का अँधेरा

छा जाता है

अँधेरा बनकर,

घर की बालकोनी में

मैं आ जाता हूँ...


एक किरण

अनायास आ जाये

कहीं से

जिंदगी बनकर,

इंतज़ार में

मैं रहता हूँ....


चक्रव्यूह

जीवन का

तोड़ सकता है

केवल एक अर्जुन,

उसे अभिमन्यु में

मैं ढूंढ़ता हूँ...

Popular posts from this blog

Grow your business with Facebook Ads

Delhi Star Kids DSK