मेरा कमरा

Tuesday, March 13, 2018

मेरा कमरा

और मेरी याददाश्त

दोनों हैं भरे

सड़ी घुटन से,

उनके बीच में

मैं रहता हूँ....


बदलते मौसम

और गुजरते दिन

लाते रहे हैं

कितने बदलाव-

अच्छे और बुरे

मैं छांटता हूँ...


कडवी यादों को

मिटा सकूँ

जेहन से

किसी तरह,

इसी प्रयास में

मैं रहता हूँ...


सुनहले पलों को

घर में अपने

सजा सकूँ

सिलसिलेवार,

ऐसी कोई तरकीब

मैं खोजता हूँ...


कभी कभी जब

मन का अँधेरा

छा जाता है

अँधेरा बनकर,

घर की बालकोनी में

मैं आ जाता हूँ...


एक किरण

अनायास आ जाये

कहीं से

जिंदगी बनकर,

इंतज़ार में

मैं रहता हूँ....


चक्रव्यूह

जीवन का

तोड़ सकता है

केवल एक अर्जुन,

उसे अभिमन्यु में

मैं ढूंढ़ता हूँ...

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