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मुझे माफ़ करो...

Tuesday, March 13, 2018

ऐ जमीन के टुकड़े

मुझे माफ़ करो...


मैं तुम्हें कहता रहा

तुम हो

मेरे सपने की जमीन

तुम्हें मैं रखूँगा संभाल

वक़्त के उस पड़ाव तक,

हो सकूँगा इतना सक्षम

कि बना सकूं

एक महल अति भव्य

सुखशांति का मक़ाम।


ऐ जमीन के टुकड़े

मुझे माफ़ करो...


तुझमे नहीं जमने दिया

पानी बरसात का,

पड़ोसियों की नालियों को

बहने नहीं दिया तुझमें,

मैंने ही आवारा बीजों को

अंकुरित होने से रोका

और मुलायम घासों से

तेरे तन को हरा नहीं होने दिया।


ऐ जमीन के टुकड़े

मुझे माफ़ करो...


तेरी स्वस्फुरित उर्वरता

चुभती थी तब

मेरे अभिमान को इस तरह

कि एक बाउंड्री बनवाकर

तुझपर मिलकियत जताने को

मैं करता रहा तुझे निर्जर

निर्ममता से इतने वर्षों तक।


ऐ जमीन के टुकड़े

मुझे माफ़ करो...


आज के हालात

हो गए हैं कुछ ऐसे

मैं एक से हो गया हूँ अनेक

और सपनों का बदलता है प्रकार

हर क्षण मन में

और जो हो नहीं सकते साकार

एक टुकड़े जमीन पे।


ऐ जमीन के टुकड़े
मुझे माफ़ करो...