परछाइयाँ

रात काली ख्वाब काले भागतीं परछाइयाँ,

मौत का है जश्न सारा नाचतीं परछाइयाँ।


हुश्न खुदा के नूर का जिस्म में दिखता नहीं

चीर सीना जो दिखाया झाँकती परछाइयाँ।


जो दुआ में हम खुदा से माँगते इंसानियत

तो हमारे हाथ आतीं झेपतीं परछाइयाँ।


चाँद तारे साज सरगम खो गए ऐ जिंदगी

दिन दहाड़े आसमां को को घेरतीं परछाइयाँ।


सुनहरे थे हाथ जिनके कब्र में तन्हा पड़ें

आदमी का भ्रम सारा तोड़ती परछाइयाँ।


क्यों नगाड़े बज रहे हैं आज भी संसार में?

क्यों हमारे भूख को है हाँकती परछाइयाँ?

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